क्यूँ_

क्यूँ? (Hindi)

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कभी तुम मुस्कुरा देते हो,कभी मुस्कुराहट छीन लेते हो,
ये क्या खेल खेलते हो तुम, नीचे गिरा कर मुझे उठा लेते हो।

बतलाते हो दस ख़ूबियाँ मेरी, बीस ख़ामियाँ भी वही गिना देते हो,
क्या चाहा है तुम्हारी, क्यूँ मेरी नींद उड़ा देते हो।

कभी समझाते हो मुझे ख़ुद, कभी खुदको नीचे गिरा देते हो,
मुझसे हिम्ममत माँगते हो, तो क्यूँ अपनी हिम्मत जला देते हो।

मुझे उठाते हो नीचे से, कभी उठाते उठाते साथ ही बेठ जाते हो,
कुछ बताते भी नहीं अब, क्यूँ अचानक यू मुरझाजते हो।

ये ज़िंदगी कोई बोझ तो नहीं, इस दिल पर फिर किसका बोझ उठाते हो,
पूछ कर दिल तुम्हारा दुखाते है रोज़, ये गुनाह रोज़ क्यूँ कराते हो।

ये जवाब तुम्हारे मेरी समझ नहीं आते, इनका मतलब पुछू तो मुँह बनाते हो,
कभी तुम मुस्कुराते देते हो, कभी मुस्कुराहट मेरी जला देते हो।

आखिर क्यूँ?

कभी तुम मुस्कुरा देते हो,कभी मुस्कुराहट छीन लेते हो,
ये क्या खेल खेलते हो तुम, नीचे गिरा कर मुझे उठा लेते हो।


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